पहलवान का भोग – भाग -3

एक महीने बाद लाल जी के ही गाँव में शोर हुआ की “पहलवान ने किसी को पकड़ लिया है। बेचारा जिन्दगी से बहुत परेशान था और अब मरने के बाद लोगो को परेशान कर रहा है।”

जिसको पहलवान ने पकड़ा था वो आदमी गाँव के एक चौक पर जा बैठा था। और लोग उसे घेर कर खड़े थे। जब उससे पूछा गया की क्या चाहिए तो उसने साफ़ साफ़ कह दिया के “लाल जी से कह दो दारू पिला दें में चला जाऊंगा।” सब इस बात को जान चुके थे की वो लाल जी के हाथो से दारू क्यों पीना चाहता है? आखिर लाल जी उसके प्रिये जो हो चुके थे। सब उसे पकड़ कर वहीँ अर्थान पर ले जाने की कोशिश करने लगे तो उसने पहलवानी करनी शुरू कर दी। एक व्यक्ति को एक तरफ फेंका तो दुसरे को दूसरी तरफ और

वापस चौक पर पलथी मर कर बैठ गया और कहने लगा “जब तक लाल जी के हाथ से दारू नहीं पी लेता में नहीं जाऊंगा।” उसकी पहलवानी देख कर किसी की फिर हिम्मत न हुयी की वो उसे पकड़ते। अब शेष सिर्फ एक ही मार्ग था की लाल जी को बुलाया जाए। सबने जाकर लाल जी को बुलाया और लाल जी इस बार तुरंत तैयार हो गए शायद उन्हें कुछ प्रश्नों के उत्तर चाहिए थे।

वो तुरंत जाकर वहां पहुँच गए वो पहलवान उन्हें देख कर इसे खुश हुआ जैसे किसी अपने से वर्षों बाद मिल रहा हो। “लाल जी आओ, देखो ये लोग मुझे मरने आ रहे थे।” उसने अपना झूठा सा दर्द बयाँ कर लाल जी की सांत्वना पानी चाहि। “क्यों परेशान कर रहे हो? दारू लेनी है तो और किसी से भी ले लो मुझे क्यों पीड़ित कर रखा है?” लाल जी ने अपने दर्द की वजह उसी को बताते हुए अपना दर्द बयां कर दिया।

“नहीं, तुम्हारे हाथो से मुझे तृप्ति मिलती है।” उसने कहा। तब तक लाल जी ने चोटिल उन दोनों व्यक्तियों को देखा। “क्यों मारा इन लोगों को? पहलवानी करनी है तो जाकर अखाड़े में करो।” लाल जी ने चोटिल उन लोगो की तरफ से कहा। “इन लोगो ने मुझे मारा। और लाल जी अखाड़े में जिन्दा लोग जाते हैं। मैं वहां नहीं जा सकता।” उसने समझाने की तर्ज में लाल जी से कहा और लाल जी भी वजह समझ गए थे। वो वजह में यहाँ आप लोगों को नहीं बता सकता।

आस पास वाले कहने लगे की “दारू देकर इसको हटाओ लाल जी। आस पास कोई ओझा तांत्रिक भी नहीं है। तुम्ही इसे हटाओ।” लोगो के कहने पर लाल जी ने उसे थोड़ी सी दारू पिलाई और वो शुक्रिया अदा करके चलता बना।

लाल जी अब और परेशां हो गए। मतलब साफ था “जब भी इसे प्यास लगेगी ये किसी को भी पकड़ लेगा और मुंह खोल कर मेरा नाम लेकर दारू मांगेगा। न जाने कहाँ कहाँ बदनाम करेगा।” इन ही ख्यालों में लाल जी कई दिन तक उलझे रहे और समाधान ढूंढने लगे।

फिर एक दिन किसी दुसरे गाँव में किसी शहर से आने वाले किसी आदमी को उसने पकड़ा और लाल जी का नाम और पता बता कर उनके हाथ से दारू पीने की इच्छा जताई। रात के करीब ग्यारह बजे थे। गाँव में ग्यारह बजे का वक़्त अत्यधिक आधी रात का वक़्त हो जाता है। उस वक़्त पर ही कुछ व्यक्ति लाल जी के घर आये साथ चलने की प्रार्थना करने लगे, यहाँ तक की पैसों की पेशकश तक कर दी। एक तो लाल जी का आलस्य ऊपर से रात का वक़्त दोनों ने पहरे लगा रखे थे मगर इतना परेशान उन लोगो को देख कर वो जाने के लिए राज़ी हो गए।

वहां पहुँचते ही लाल जी को वो देख कर ख़ुशी से बोला “आओ लाल जी।” लाल जी झल्ला गए और गुस्से में उसकी सेंकने लगे “क्या है बे साले। क्यों दुखी कर रखा है? ना रात देखे न दिन।” मगर वो फिर भी विनम्रता से बोला “बस तुम्हारे हाथो से दारू चाहिए थी। इतने दिनों से तुम उस तरफ भी नहीं आये तो देखा भी नहीं था।” “जान लेगा क्या मेरी? नाम बदनाम कर दिया है मेरा और ऊपर से मेरी खुशामती करता है। अगर जिन्दा होता तो में तुझे मार देता।” लाल जी गुस्से में बद्बदाये जा रहे थे। “जान जाने का दुःख तो मुझे है। तुम मुझे बस दारू पिला दो और जाने दो तुम्हारी उम्र बहुत है उसकी चिंता न करो।” उसने लाल जी के गुस्से का फिर से सरल उत्तर दिया।

लाल जी को कुछ नहीं सूझा उन्होंने उसे दारू देकर विदा कर दिया। और अब उन्होंने कई जगह जाकर कई ओझा तांत्रिक ढूंढे ताबीज वगेरह बनवाई ताकि वो पहलवान परेशान न कर सके। मगर इन सबका कोई ओचित्य नहीं था। क्योकि उसे तो सिर्फ लाल जी से दारू चाहिए थी न की लाल जी को कोई नुक्सान पहुँचाना था। दुआ ताबीज के बावजूद कहीं न कहीं से खबर आती की फला गाँव में फला फला आदमी को किसी ने पकड़ लिया है और वो लाल जी को बुला रहा है।

लाल जी तुरंत समझ जाते और अनमने मन से वहां लोगो के आग्रह पर चले जाते। चार गाली उसको देते चार गाली खुद को और अपने आलस्य को। अगर वो उन दिनों अर्थान पर जाकर भोग देते तो शायद ये मुसीबत कभी उनके पीछे न लगती।

कभी बरसात, कभी जलती धूप, कभी रात, कभी सुबह, कभी कहीं तो कभी कही से कोई आ जाता के लाल जी चलो दारू देके उसको बचा लो। उन्हें अपना काम छोड़ कर भी जाना पड़ जाता। लाल जी को ये सब करते हुए करीब एक साल बीत चुका था। अभी तक उन्हें कोई काबिल जानकार नहीं मिला था की वो अपना पीछा छुड़ा पाते, जो मिले भी उन्होंने हाथ डालने से मना कर दिया।

एक बार कहीं से एक जोगी घूमता फिरता न जाने कहाँ से उस गाँव में आ गया। उसने लाल जी के घर का पता पूछा। और लाल जी के घर पहुँच गया। लाल जी ने जब एक अनजान आदमी को देखा तो वो तुरंत तैयार हो गए की फिर से उसी ने किसी को पकड़ा होगा जिससे ये जोगी बुलाने आया है।

“लाल जी आपसे एक बात करनी है। क्या आप मेरे साथ थोड़ी देर के लिए बाहर आएंगे ?” जोगी ने लाल जी से कहा। लाल जी को उनके बड़े भाई को भी थोड़ी हैरानी हुयी के बुलाने नहीं आय सिर्फ बात करने आये हैं। जोगी लाल जी को एक किनारे ले गए।

“मैंने एक पहलवान जेसे आदमी को वहां रेल की पटरी पर देखा है वो मर चुका है। उसने मुझे तुम तक ये सन्देश देने को कहा है की तुम उसे दारू पिलाओ एक निश्चित समय अंतराल पर। क्या तुम जानते हो उसे?” जोगी ने लाल जी से कहा।

इतना कहना की लाल जी ने सारी अपनी व्यथा जोगी को सुना दी और कहा की” शायद ये मेरी भाग्य ही है जो मुझे अपने आलस्य की सज़ा इस कदर मिल रही है।” जोगी ने सारी बात सुनी और कहा के “मैं तुम्हे इससे निजात दिल सकता हूँ मगर तुम्हे इसके लिए एक दारू की बोतल के साथ मेरे साथ आना होगा वहीँ पर।”

लाल जी को तो जैसे भगवान् मिल गए आखिर किसी ने तो कहा की वो उन्हें निजात दिला सकता है। लाल जी फिर उस जोगी के कहने पर छत से भी कूद जाते। वो इस बात के लिए राज़ी हो गए। लाल जी ने उन्हें अपने घर में ही ठहराया। वो एक विचरण करते जोगी थे। उस वक़्त में इस तरह के साधू अक्सर हुआ करते थे। जो अपना ठिकाना एक जगह नहीं बनाते थे और जन कल्याण में जीवन समर्पित कर देते थे।

वो लाल जी के घर एक दिन रुके और सिर्फ फलाहार किया। रात में उन्होंने लाल जी उस पहलवान के स्थान पर जाकर एक बोतल शराब रख आने को कहा और फिर लाल जी सो जाने के लिए कह कर खुद रात भर जागते रहे और न जाने बिना किसी सामग्री के कौन सी क्रिया करी।

सुबह उठ कर उन्होंने एक डिबिया सी दिखाई लाल जी को उनके बड़े भाई को और कहा के इसे रख लो जब कभी पहलवान से कोई काम करवाना हो तो ये डिबिया खोल कर थोड़ी सी शराब पिला देना, तुम्हारा सारा कहा मानेगा। लेकिन इस डिबिया को कभी खाली मत करना। लेकिन लाल जी और उनके बड़े भाई दोनों ने उसे रखने से मना कर दिया और भेंट स्वरुप जोगी बाबा को नए वस्त्र दिए। जिसे उन्होंने ख़ुशी से स्वीकार किया और अपने रस्ते चल दिए।

लाल जी के लिए तो वो साक्षात् भगवान् का अवतार थे। तब से लाल जी ने निर्णय लिया की आलस्य को दुबारा हावी नहीं होने देंगे। और न ही बिना जाने कहीं भी किसी को भी भोग देंगे।

दोस्तों इस घटना को जानने के बाद ये सीख मिली है कई लोगों को की, कहीं भी किसी के भी नाम से भोग नहीं देना चाहिए। क्योकि हम नहीं जानते की उसे कौन ले रहा है। कई लोग इस तरह से भोग अर्पित करते हैं। याद रखिये हर भोग विधिवत होना चाहिए। यूँ ही बिना जानकारी के सिर्फ नाम लेकर अर्पित किया गया भोग अक्सर दूसरी शक्तियां ही ग्रहण करती हैं और इसकी आदि हो जाती हैं। इसलिए बिना किसी जानकार की सलाह के इसे कार्य बिलकुल न करें।

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